(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.18. अध्यायः 018
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति श्रीकृष्णमहिमप्रतिपादकव्यासमद्रराजसंवादानुवादः॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

`द्वैपायन उवाच।

सर्वे वेदाः सर्ववेद्याः सशास्त्राः
सर्वे यज्ञाः सर्व इत्यश्च कृष्णः।
विदुः कृष्णं ब्राह्मणास्तत्वतो ये
तेषां राजन्सर्वयज्ञः समाप्तः॥ 13-18-1(81770)
ज्ञेयो योगी ब्राह्मणैर्वेदतत्वै-
रारण्यकैः सैष कृष्णः प्रभुत्वात्।
सर्वान्यज्ञान्ब्राह्मणान्ब्रह्म चैव
व्याप्यातिष्ठद्देवदेवस्त्रिलोके॥ 13-18-2(81771)
स एष देवः शक्रमीशं यजानं
प्रीत्या प्राह क्रतुयष्टारमग्र्यम्
न मा शक्रो वेदवेदार्थतत्वा-
द्भक्तो भक्त्या शुद्धभावप्रधानः॥ 13-18-3(81772)
मा जानन्ते ब्रह्मशीर्षं वरिष्ठं
विश्वे विश्वं ब्रह्मयोनिं ह्ययोनिम्।
सर्वत्राहं शाश्वतः शाश्वतेशः
कृत्स्नो वेदोऽग्निर्निर्गुणोऽनन्ततेजाः॥ 13-18-4(81773)
सर्वे देवा वासुदेवं यजन्ते
ततो बुद्ध्या मार्गमाणास्तनूनाम्।
सर्वान्कामान्प्राप्नुवन्ते विशालां-
स्त्रैलोक्येऽस्मिन्कृष्णनामाभिधानात्॥ 13-18-5(81774)
कृष्णो यज्ञैरिज्यते यायजूकैः
कृष्णो वीर्यैरिज्यते विक्रमद्भिः।
कृष्णो वाक्यैरिज्यते सम्मृशानैः
कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः॥ 13-18-6(81775)
विद्यावन्तः सोमपा ये विपापा
इष्ट्वा यज्ञेर्गोचरं प्रार्थयन्ते। 13-18-7(81776)
भवगानुवाच।
सर्वं क्रान्तं देवलोकं विशाल-
मन्ते गत्वा मुक्तिलोकं भजन्ति॥ 13-18-7x(6789)
एवं सर्वे त्वाश्रमाः सुव्रता ये
मां जानन्तो यान्ति लोकानदीनान्।
ये ध्यानदीक्षामुद्वहन्तो विपापा
ज्योतिर्भूत्वा देवलोकं भजन्ति॥ 13-18-8(81777)
पूज्यन्ते मां पूजयन्तः प्रहृष्टा
मां जानन्तः श्रद्धया वासुदेवम्।
भक्त्या तुष्टोऽहं तस्य सत्त्वं प्रयच्छे
सत्वस्पृष्टो वीतमोहोऽयमेति॥ 13-18-9(81778)
द्वैपायन उवाच। 13-18-10x(6790)
ज्योतींषि शुक्तानि च यानि लोके
त्रयो लोका लोकपालास्त्रयश्च।
त्रयोऽग्नयश्चाहुतयश्च पञ्च
सर्वे देवा देवकीपुत्र एव॥ 13-18-10(81779)
भीष्म उवाच। 13-18-11x(6791)
व्यासस्यैतद्वचः श्रुत्वा मद्रराजः सहर्षिभिः।
व्यासं कृष्णं च विधिवत्प्रीतात्मा प्रत्यपूजयत्॥ 13-18-11(81780)
वैशम्पायन उवाच। 13-18-12x(6792)
कविः प्रयातस्तु महर्षिपुत्रो
द्वैपायनस्तद्वचनं निशम्य।
जगाम पृथ्वीं शिरसा महात्मा
नमश्च कृष्णाय चकार भीष्मः॥' ॥ 13-18-12(81781)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणी दानधर्मपर्वणि अष्टादशोऽध्यायः॥ 18 ॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.